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आरक्षण रोस्टर पर घिरी सरकार, हाईकोर्ट ने मांगा जवाब

                                                   हिमाचल हाईकोर्ट ने सरकार से तलब किया स्पष्टीकरण

शिमला,ब्यूरो रिपोर्ट 

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अलग-अलग पंचायतों की ओर से आरक्षण रोस्टर को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सरकार को विस्तृत जवाब दाखिल करने के आदेश दिए हैं। सोमवार को इन याचिकाओं पर सुनवाई हुई। कोर्ट ने इन सभी याचिकाओं में कोई भी अंतरिम आदेश पारित नहीं किए। लेकिन न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने इन मामलों में सरकार को विस्तृत जवाब दाखिल करने के आदेश दिए है।

सुनवाई 11 मई को होगी। 7 अप्रैल को आरक्षण रोस्टर जारी किया गया था। इसके मुताबिक कई पंचायतें और जिला परिषद कई वर्षों से आरक्षित ही रह गई हैं, इसी मामले को लेकर हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिकाओं में नियमों को दरकिनार कर संबंधित सीटें आरक्षित करने का आरोप लगाया गया है। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकारी टेंडर में तकनीकी शर्तें अनिवार्य होती हैं और उनमें मामूली कमी होने पर भी किसी ठेकेदार को अयोग्य ठहराना सही है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने चंबा के कीरू में बनने वाले 125 मीटर लंबे आर्च ब्रिज से जुड़ी याचिका को खारिज कर दिया है।अदालत ने कहा कि टेंडर दस्तावेज तैयार करने वाला विभाग ही उसकी शर्तों का सबसे अच्छा निर्णायक होता है। जब तक कोई स्पष्ट दुर्भावना न दिखे, कोर्ट विशेषज्ञों द्वारा किए गए तकनीकी मूल्यांकन में हस्तक्षेप नहीं करेगा। 

अदालत के इस फैसले से यह साफ हो गया है कि बुनियादी ढांचे के संवेदनशील प्रोजेक्ट्स में सुरक्षा और तकनीकी मानकों से किसी भी स्तर पर समझौता नहीं किया जा सकता। तकनीकी मूल्यांकन में अदालती तुलना की अनुमति नहीं दी जा सकती। खंडपीठ ने कहा कि अदालती समीक्षा का उद्देश्य केवल यह देखना है कि निर्णय प्रक्रिया कानूनन सही है या नहीं, केवल कम बोली (एल-1) होना काफी नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई बोलीदाता तकनीकी रूप से ही अयोग्य है, तो उसकी कम वित्तीय बोली का कोई महत्व नहीं रह जाता। याचिकाकर्ता ने नेशनल हाईवे 154-ए पर 30.85 करोड़ की लागत से बनने वाले पुल के टेंडर में हिस्सा लिया था। विभाग ने तकनीकी जांच के बाद उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया। विभाग का तर्क था कि निविदा की शर्तों के अनुसार ठेकेदार के पास कम से कम 97.90 मीटर लंबे पुल निर्माण का पिछला अनुभव होना चाहिए था, जबकि याचिकाकर्ता का अनुभव केवल 97.20 मीटर का पाया गया। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि उनकी निर्माण क्षमता में केवल 0.70 मीटर की कमी है और वह सबसे कम बोली लगाने वाले (एल-1) है, जिससे सरकार के 2.82 करोड़ बचेंगे। कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि तकनीकी शर्तें अनिवार्य होती हैं और उनमें ढील नहीं दी जा सकती।


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