फ्री ट्रेड एग्रीमेंट का असर: विदेशी सेब से बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा, किसानों पर संकट
शिमला,ब्यूरो रिपोर्ट
भारत और न्यूजीलैंड के बीच सोमवार को हस्ताक्षरित मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के तहत सेब पर आयात शुल्क में बड़ी कटौती का प्रावधान हिमाचल प्रदेश के बागवानों के लिए चिंता का कारण बन गया है। समझौते के अनुसार न्यूजीलैंड से आयातित सेब पर 50 प्रतिशत शुल्क को घटाकर 25 प्रतिशत किया जाएगा, हालांकि यह राहत एक निर्धारित कोटा के भीतर ही लागू होगी।
इस समझौते के तहत पहले वर्ष में 32,500 मीट्रिक टन सेब आयात को रियायती शुल्क मिलेगा, जो छठे वर्ष तक बढ़कर 45,000 मीट्रिक टन तक पहुंच जाएगा। कोटा से अधिक आयात पर मौजूदा 50 प्रतिशत शुल्क ही लागू रहेगा। साथ ही 1.25 अमेरिकी डॉलर प्रति किलोग्राम का न्यूनतम आयात मूल्य (एमआईपी) भी तय किया गया है, जो 1 अप्रैल से 31 अगस्त की अवधि के लिए प्रभावी रहेगा।विशेषज्ञों और बागवान संगठनों का मानना है कि शुल्क में कमी के चलते न्यूजीलैंड के सेब भारतीय बाजार में सस्ते पड़ेंगे। इससे स्थानीय सेब की मांग घटने और कीमतों में गिरावट की आशंका है। खासतौर पर गाला और फूजी जैसी विदेशी किस्में बेहतर गुणवत्ता और आकर्षक पैकेजिंग के कारण उपभोक्ताओं को आसानी से अपनी ओर आकर्षित कर सकती हैं।
हिमाचल प्रदेश संयुक्त किसान मंच के संयोजक हरीश चौहान ने कहा कि हिमाचल के बागवानों के लिए सबसे बड़ी चिंता ऑफ-सीजन बाजार को लेकर है। भारत में सेब का मुख्य सीजन अगस्त से नवंबर तक रहता है, जबकि न्यूजीलैंड का उत्पादन इसके विपरीत समय पर होता है। ऐसे में कम शुल्क के चलते विदेशी सेब उन महीनों में भी बाजार में उपलब्ध रहेंगे, जब स्थानीय सेब कोल्ड स्टोरेज से बेचे जाते हैं। इससे स्टोरेज वाले सेब के दाम गिर सकते हैं और बागवानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।बागवान संगठनों ने इस समझौते का विरोध करते हुए सरकार से स्थानीय उत्पादकों के हितों की रक्षा के लिए विशेष कदम उठाने की मांग की है।

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