फुंजा पंचायत में दादा-पोते के बीच हुई सीधी टक्कर
शिमला,रिपोर्ट नवीन शर्मा
पंचायत चुनावों में अक्सर राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता देखने को मिलती है, लेकिन रामपुर विकास खंड की फुंजा पंचायत में इस बार लोकतंत्र ने एक ऐसी अनोखी कहानी लिखी, जिसने पूरे क्षेत्र का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। यहां प्रधान पद के चुनाव में सगे दादा और पोता आमने-सामने थे। मुकाबला केवल दो उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि अनुभव और युवा सोच के बीच भी माना जा रहा था।फुंजा पंचायत के प्रधान पद के लिए हुए इस चर्चित चुनाव में युवा उम्मीदवार गुड्डू टैगटा ने अपने सगे दादा और राजनीति के अनुभवी चेहरे प्रेम लाल टैगटा को 322 मतों के बड़े अंतर से पराजित कर जीत हासिल की।
चुनाव परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया कि पंचायत की जनता ने इस बार नई सोच और युवा नेतृत्व पर भरोसा जताया है।मतगणना के अनुसार गुड्डू टैगटा को कुल 713 वोट प्राप्त हुए, जबकि प्रेम लाल टैगटा को 391 मत मिले। चुनाव प्रचार के दौरान यह मुकाबला पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना रहा। ग्रामीणों के बीच लगातार यह सवाल उठता रहा कि पंचायत की कमान अनुभवी नेतृत्व के हाथों में जाएगी या फिर युवा पीढ़ी को जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। आखिरकार मतदाताओं ने अपना फैसला सुनाते हुए युवा उम्मीदवार के पक्ष में जनादेश दिया।परिणाम घोषित होते ही फुंजा पंचायत में उत्सव का माहौल बन गया। समर्थकों ने ढोल-नगाड़ों की थाप पर जीत का जश्न मनाया और मिठाइयां बांटकर अपनी खुशी का इजहार किया। दूसरी ओर, हार के बावजूद प्रेम लाल टैगटा ने लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करते हुए जनता के फैसले को सहजता से स्वीकार किया।
उन्होंने अपने पोते गुड्डू टैगटा को जीत की बधाई दी और उज्ज्वल भविष्य के लिए आशीर्वाद भी दिया। यह दृश्य पंचायत चुनावों में स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराओं की एक मिसाल बन गया।नवनिर्वाचित प्रधान गुड्डू टैगटा ने जीत के बाद पंचायतवासियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि जनता ने जिस विश्वास और उम्मीद के साथ उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी है, उसे पूरा करना उनका सबसे बड़ा दायित्व होगा। उन्होंने भरोसा दिलाया कि पंचायत में सड़क, पेयजल, स्वच्छता, ग्रामीण विकास और अन्य मूलभूत सुविधाओं को प्राथमिकता के आधार पर मजबूत किया जाएगा।
साथ ही लोगों की समस्याओं का समयबद्ध समाधान सुनिश्चित करने के लिए निरंतर प्रयास किए जाएंगे।फुंजा पंचायत का यह चुनाव अब पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। यह केवल एक चुनावी मुकाबला नहीं, बल्कि लोकतंत्र की उस खूबसूरत तस्वीर का उदाहरण है जहां परिवार के भीतर चुनावी प्रतिस्पर्धा होने के बावजूद रिश्तों की गर्माहट और लोकतांत्रिक मर्यादाएं बरकरार रहीं। दादा और पोते के बीच हुआ यह मुकाबला आने वाले समय में पंचायत राजनीति की एक यादगार कहानी के रूप में याद किया जाएगा।

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