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सरकारी खर्चे पर पीजी करने वाले डॉक्टरों को नहीं दी नियुक्ति

                                                               अधिकारियों पर कार्रवाई के आदेश

शिमला,ब्यूरो रिपोर्ट 

हिमाचल हाईकोर्ट ने सरकारी खर्चे पर पीजी (एमडी/एमएस) करने वाले डॉक्टरों को पॉलिसी के तहत नियुक्ति न देने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों के असंवेदनशील रवैये के कारण प्रदेश 45 विशेषज्ञ डॉक्टरों की सेवाओं से वंचित हो गया। 

याचिकाकर्ता डॉक्टरों को बॉन्ड की सेवा शर्तों से मुक्त करने का फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को उनकी मूल एमबीबीएस डिग्री और बॉन्ड के रूप में लिए बिना तारीख वाले चेक एक सप्ताह के भीतर वापस करने का आदेश दिए हैं।न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने याचिकाकर्ताओं को बॉन्ड की शर्त से मुक्त न करने के सरकार के निर्देशों को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने अधिकारियों की लापरवाही और असंवेदनशील रवैये पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि यह पॉलिसी और बॉन्ड के नियमों एवं शर्तों का उल्लंघन है। मूल डिग्री के बिना डॉक्टर आगे की पढ़ाई या रोजगार के लिए आवेदन नहीं कर सकते हैं। न्यायालय ने हिमाचल के स्वास्थ्य मंत्री को निर्देश दिए हैं कि वे दोषी अधिकारियों के खिलाफ कानून के अनुसार उचित कार्रवाई करें, ताकि इस तरह की गलती भविष्य में दोबारा न हो। 

इस संबंध में की गई किसी भी कार्रवाई की अनुपालना रिपोर्ट तीन सप्ताह के भीतर अदालत में एक हलफनामे के माध्यम से पेश करनी होगी।पीजी सुपर स्पेशलिटी पॉलिसी के तहत एमएस और एमडी का परिणाम आने के एक माह के भीतर डॉक्टरों को फील्ड पोस्टिंग देने की व्यवस्था है। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार परिणाम घोषित होने के एक महीने के भीतर याचिकाकर्ताओं को फील्ड पोस्टिंग देने में विफल रही। पीजी डॉक्टरों की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर में कहा गया कि एमडी और एमएस की अंतिम वर्ष की परीक्षा का परिणाम 7 मार्च को घोषित किया गया था, जबकि पोस्टिंग के आदेश 10 अप्रैल को जारी किए गए। यह बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन है। ऐसे में बॉन्ड रूप में जमा की गई उनकी मूल एमबीबीएस डिग्री और चेक वापस किए जाएं। उन्होंने तर्क दिया है कि उन्हें राज्य में सेवा के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है, क्योंकि सरकार ने बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन किया है। गौरतलब है कि बाॅन्ड पॉलिसी की सेवा-शर्तो के तहत सरकारी खर्चे पर पीजी करने वाले डॉक्टरों को दो साल प्रदेश में सेवा देना अनिवार्य हैं।

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