अवैध खनन के 40,000 से अधिक मामलों पर भी केंद्र की नाराजगी
शिमला,ब्यूरो रिपोर्ट
उद्योग विभाग की लापरवाही के कारण हिमाचल प्रदेश में अवैध खनन का काला कारोबार फल-फूल रहा है। सोमवार को हिमाचल प्रदेश विधानसभा में पेश हुई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) रिपोर्ट के अनुसार 2018-23 के बीच प्रदेश में अवैध खनन के 40,757 मामले दर्ज किए गए। रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि बिजली खपत के आधार पर रॉयल्टी का सही आकलन नहीं होने से 27 लीज धारकों से 1.81 करोड़ की कम वसूली हुई।
वहीं सोलन और ऊना जैसे सीमावर्ती जिलों में अवैध परिवहन रोकने के लिए बनाई गई चेक-पोस्ट भी स्टाफ की कमी के कारण सफेद हाथी साबित हो रही हैं ।आपदा प्रभावितों को समय पर मदद देने के बजाय प्रदेश सरकार नियमों की अनदेखी कर रही है। कैग ने पाया कि एसडीआरएफ के फंड का सही उपयोग नहीं होने के कारण केंद्र सरकार ने 61.07 करोड़ रुपये की सहायता रोक ली है। वहीं नियमों के विरुद्ध 122.27 करोड़ की राशि बचत खातों में रखी गई, जिससे ब्याज का भारी नुकसान हुआ। ऑडिट में यह भी सामने आया कि आपदा राहत के लिए मिले फंड का इस्तेमाल नए निर्माण और सामान्य मरम्मत जैसे अनधिकृत कार्यों पर किया गया। जल शक्ति विभाग की खराब योजना के कारण किसानों को सिंचाई का लाभ नहीं मिल पा रहा है। कैग की रिपोर्ट के अनुसार, जांचे गए क्षेत्रों में 163 स्वीकृत योजनाओं में से केवल 72 ही पूरी हो सकीं। देरी के कारण 18 योजनाओं की लागत में 8.83 करोड़ की बढ़ोतरी हो गई।
इसके अलावा, नियमों को ताक पर रखकर ई-टेंडरिंग से बचने के लिए 48.25 करोड़ के कार्यों को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट दिया गया, जो कि एक बड़ी वित्तीय अनियमितता है ।हिमाचल प्रदेश वन विभाग की ओर से कैंपा (प्रतिपूरक वनीकरण कोष प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण) फंड के तहत नेट प्रेजेंट वैल्यू के गलत आकलन से सरकारी खजाने को 1.33 करोड़ का नुकसान होने की संभावना जताई गई है। ऑडिट में पाया गया कि चंबा सर्कल के मामलों में वनों के वर्गीकरण में गलती की गई, जिससे ऊंची दरों के बजाय कम दरों पर वसूली हुई। साथ ही, कई सड़कों का निर्माण बिना पूर्व अनुमति के किया गया, जो वन संरक्षण अधिनियम का खुला उल्लंघन है।2023-24 तक प्रतीक्षित उपयोगिता प्रमाणपत्रों की संख्या 1,375 थी और 2024-25 तक इनकी संख्या 1,146 थी। 2023-24 तक ये 1,176.48 करोड़ और 2024-25 तक 2,148.05 करोड़ रुपये के प्रतीक्षित रहे। कुल 2,521 उपयोगिता प्रमाणपत्रों पर 3,324.53 करोड़ रुपये की राशि का व्यय होना था। 2024-25 में निर्धारित तिथि तक तीन और 38.61 करोड़ रुपये के उपयोगिता प्रमाणपत्र ही दिए गए।


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