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कुफरी के आलू ने रचा इतिहास: 79 उन्नत किस्मों से देशभर में चमका नाम

                              इन किस्मों ने उत्पादन बढ़ाने के साथ किसानों की आय में भी इजाफा किया

शिमला,ब्यूरो रिपोर्ट 

राजधानी शिमला से 15 किलोमीटर दूर ऊंचे पहाड़ पर स्थित है कुफरी। समुद्र स्तर से इसकी ऊंचाई 2,720 मीटर या लगभग 9,000 फीट है। सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र होने से तो यह स्थान मशहूर है ही। आलू के बीज की नई-नई किस्मों पर कुफरी में प्रयोग से इसका नाम देश के हर किसान की जुबान पर है।

केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान शिमला यहां पर दशकों से आलू पर नित नए प्रयोग कर रहा है। भारत की आजादी के दो साल बाद 1949 में स्थापित किया संस्थान 79 से अधिक कुफरी आलू किस्में विकसित कर चुका है। सर्दियों में यहां पर तीन से चार फीट तक बर्फ गिरती है। तापमान कई बार -5 से -18 डिग्री तक भी चला जाता है। पहाड़ी जलवायु और वैज्ञानिक अनुसंधान के तालमेल से यहां से तैयार होने वाले आलू के बीज देशभर के किसानों की पैदावार तो बढ़ा रहे हैं। सबसे बड़ी खासियत है रोगमुक्त बीज उत्पादन। यहां उन्नत लैब तकनीकों और नियंत्रित वातावरण में आलू के ऐसे बीज तैयार किए जाते हैं, जिनमें वायरस और बीमारियों का खतरा बेहद कम होता है। यही बीज आगे किसानों तक पहुंचकर बेहतर उत्पादन सुनिश्चित कर सकते हैं।नई किस्में कुफरी रतन, कुफरी तेजस, कुफरी चिपभारत-1, कुफरी चिपभारत-2 हैं।

 अन्य किस्में कुफरी आनंद, कुफरी अशोक, कुफरी बादशाह, कुफरी ज्योति, कुफरी चंद्रमुखी, कुफरी पुखराज, कुफरी सिंधुरी, कुफरी साह्याद्री और कुफरी करण हैं। सीपीआरआई की किस्में ज्यादा उत्पादन, बदलते मौसम और जलवायु परिस्थितियों के प्रति भी अधिक सहनशील होती हैं। संस्थान की ओर से समय-समय पर वर्कशॉप और फील्ड विजिट के जरिए किसानों को आधुनिक खेती के तरीके सिखाए जाते हैं। कुफरी के नाम से तैयार आलू का बीज देश के कोने-कोने में मशहूर है। संस्थान ने 79 किस्में तैयार कर दी हैं। भारत चीन के बाद सबसे बड़ा आलू उत्पादक देश है। इसमें कुफरी नाम से तैयार इन किस्मों का भी बड़ा योगदान है।केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान से कुफरी को अलग पहचान मिली है। स्थानीय लोगों को इससे रोजगार मिला है। कुफरी की ठंडी आबोहवा यहां रोगरहित बीज तैयार करने में सहायक है।


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