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हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पंजाब के समान वेतनमान देना अनिवार्य नहीं

                        कर्मचारियों को झटका: राज्य सरकार पर समान वेतनमान की बाध्यता नहीं

शिमला,ब्यूरो रिपोर्ट 

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार अपने कर्मचारियों को पंजाब सरकार के समान वेतनमान देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है। न्यायालय ने कहा कि वेतनमान का निर्धारण करना कार्यपालिका का विशेष अधिकार है और अदालतें इसमें तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं, जब तक कि सांविधानिक प्रावधानों का उल्लंघन न हो।

 न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि भारत राज्यों का एक संघ है और प्रत्येक राज्य की अपनी शासन व्यवस्था है। एक राज्य दूसरे राज्य के नियमों या वेतनमानों को मानने के लिए बाध्य नहीं है। पदों का वर्गीकरण और वेतनमान का निर्धारण विशेषज्ञ निकायों (जैसे वेतन आयोग) का काम है। अदालतें समान काम के लिए समान वेतन के सिद्धांत को यांत्रिक रूप से लागू नहीं कर सकतीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि विभाग के किसी अधिकारी ने उच्च वेतनमान की सिफारिश की है, तो उसे सरकार का अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता। 

वह केवल एक व्यक्तिगत राय मात्र है।गौरतलब है कि यह याचिका नेक राम और अन्य तकनीकी कर्मचारियों ने दायर की थी, जो जेल विभाग में जूनियर तकनीशियन (वीविंग मास्टर और कारपेंटर मास्टर) के पदों पर कार्यरत थे। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की थी कि उनका वेतनमान 3120-5150 से बढ़ाकर 3330-6200 किया जाए। यह संशोधन 1 जनवरी 1996 से लागू हो और बकाया राशि 12 फीसदी ब्याज के साथ दी जाए। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि पंजाब सरकार ने अपने तकनीकी मास्टरों को यह उच्च वेतनमान दिया है और चूंकि हिमाचल प्रदेश आमतौर पर पंजाब के वेतन पैटर्न को अपनाता है, इसलिए उन्हें भी इसका लाभ मिलना चाहिए। वहीं राज्य सरकार और वित्त विभाग ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा कि हिमाचल प्रदेश के अपने सेवा नियम और वित्तीय संसाधन हैं। सरकार ने तर्क दिया कि पंजाब के वेतनमान को केवल एक आधार के रूप में लिया जाता है, लेकिन उसे हूबहू लागू करना अनिवार्य नहीं है।



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