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📚 प्राथमिक पाठशाला ओल्वा का विलय रद्द, अभिभावकों में खुशी

                                      🏫 सरकार का यू-टर्न: प्राथमिक पाठशाला ओल्वा का विलय रद्द

शिमला,ब्यूरो रिपोर्ट 

हाईकोर्ट ने कुल्लू जिले की राजकीय प्राथमिक पाठशाला(जीपीएस)ओल्वा के स्कूल के जीपीएस माटल में किए गए विलय के निर्णय को रद्द कर दिया है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने सरकार की ओर से विलय वापस लेने के लिखित आश्वासन के बाद इस याचिका का निपटारा कर दिया है।  याचिकाकर्ता स्कूल प्रबंधन समिति की ओर से सरकार की ओर से जारी 17 अगस्त 2024 की अधिसूचना, जिसके तहत ओल्वा स्कूल का विलय माटल स्कूल में कर दिया गया था को चुनौती दी थी।

अब सरकार ने इस निर्णय को वापस ले लिया है।शिक्षा निदेशक, हिमाचल प्रदेश ने 23 मार्च 2026 को एक पत्र के माध्यम से निर्देश जारी किए हैं कि राजकीय प्राथमिक पाठशाला ओल्वा आगामी आदेशों तक स्वतंत्र रूप से कार्य करती रहेगी। सरकार के इस आदेश के बाद स्कूल को फिलहाल राहत मिल गई है, लेकिन कोर्ट को यह भी बताया गया कि अगले शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में स्कूल में छात्रों के नामांकन की समीक्षा की जाएगी, जिसके आधार पर भविष्य का निर्णय लिया जाएगा।हिमाचल हाईकोर्ट में हिमालय ग्रीन कंपनी की ओर से प्रदेश में प्लास्टिक बैग बेचने पर लगे प्रतिबंध को हटाने को लेकर दायर याचिका को वापस ले लिया है। याचिका में प्रदेश सरकार की ओर से जारी 21 जनवरी 2025 की अधिसूचना को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत राज्य सरकार ने उन प्लास्टिक बैगों की बिक्री और उपयोग पर भी रोक लगा दी है जो ईको-फ्रेंडली या बायोडिग्रेडेबल नहीं है।सुनवाई के दौरान अदालत को सूचित किया कि अधिसूचना को चुनौती तो दी गई है लेकिन अधिनियम को नही।।न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि कंपनी की ओर से केवल अधिसूचना को चुनौती दी गई है लेकिन जिस एक्ट के तहत यह अधिसूचना लाई गई है उसे चुनौती नहीं दी गई है। 

कंपनी ने वर्तमान याचिका को वापस लेते हुए अदालत से गुहार लगाई कि उन्हें नए तरीके से याचिका को दायर करने की अनुमति दी जाए, जिसे अदालत ने स्वीकार किया। सरकार की ओर से महाधिवक्ता अनूप रतन बताया कि प्रदेश में कुछ प्लास्टिक उत्पादों को बेचने पर प्रतिबंध लगाया गया है। कंपनी जिस प्लास्टिक बैग को बेचने की अनुमति मांग रही है वह बायोडिग्रेडेबल नहीं है।प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकारी टेंडर प्रक्रिया के दौरान तकनीकी शर्तों का पालन अनिवार्य है। न्यायालय ने ए श्रेणी के एक सरकारी ठेकेदार की ओर से दायर उन तीनों याचिकाओं को खारिज कर दिया है, इसमें उसने टेंडर प्रक्रिया से बाहर किए जाने को चुनौती दी थी। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि साझेदारी फर्म एक अलग कानूनी इकाई होती है। किसी व्यक्ति की ओर से व्यक्तिगत क्षमता में भरे गए टेंडर के लिए फर्म का जीएसटी नंबर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ता ने दूसरे ठेकेदारों का उदाहरण दिया था जिनके टेंडर स्वीकार किए गए थे। कोर्ट ने पाया कि उन ठेकेदारों ने अपनी प्रोपराइटरशिप फर्मों के नंबर दिए थे, न कि किसी साझेदारी फर्म के। खंडपीठ ने माना कि वन निगम का निर्णय सही था और इसमें कोई पक्षपात व मनमानी नहीं की गई है।


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