प्राचीन शिलालेखों और दु*र्लभ धरोहरों के जरिए इति*हास की अनकही कहानियां जान रहे लोग
शिमला,ब्यूरो रिपोर्ट
हिमाचल प्रदेश राज्य संग्रहालय शिमला में आज भी ऐसे पत्थर संरक्षित हैं, जिनमें 3500 साल पहले दुर्लभ चित्र उकेरे गए हैं। इन्हें पेट्रोग्लिफ्स भी कहा जाता है। ये प्राचीन शिलालेख स्पीति घाटी से प्राप्त हुए हैं और इन्हें हिमालयी क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक खोजों में माना जाता है। पत्थरों पर उकेरे गए प्रतीकों में नीली भेड़, घोड़ा, सूर्य, चंद्रमा, याक, बारहसिंगा, हिरण, बाघ आदि शामिल हैं। माना जाता है कि यह निशान पाषाण युग के मानव की ओर से दिशाओं का ज्ञान प्राप्त करने और गिनती करने के लिए बनाए गए थे।कुंजम दरें से समदो तक फैली लगभग पूरी घाटी में शिलालेख ,पत्थर पर उकेरी गई आकृतियां मौजूद हैं। इनमें से अधिकांश स्पीति के निचले हिस्से से मिली हैं।
ये शिलालेख साधारण पत्थर के औजारों से चट्टानों पर उकेरी गई हैं। कुछ मामलों में ये बहुत सरल हैं और इनमें केवल एक ही आकृति है जबकि अन्य में मानवाकृति, पशुकृति और ज्यामितीय आकृतियों का एक जटिल संयोजन है। माना जाता है कि यह शिलाशिल्प उस काल के भी हो सकते हैं जो मानव इतिहास का वह प्रारंभिक समय है जब मनुष्य का अस्तित्व तो था लेकिन लेखन कला का आविष्कार नहीं हुआ था।राज्य संग्रहालय के अध्यक्ष डॉ. हरी चौहान ने बताया कि यह पेट्रोग्लिफ्स 1300 से 1500 ईसा पूर्व यानि 3500 साल पुराने हैं। ये मुख्य रूप से पूर्व-बौद्ध संस्कृति खासा या अन्य प्राचीन समुदायों से जुड़े हैं और तिब्बत, लद्दाख और मध्य एशिया की रॉक आर्ट से समानताएं दिखाते हैं।
ताबो के पास लरी गांव पेट्रोग्लिफ्स का सबसे बड़ा स्थल है जहां दो हजार से अधिक बोल्डरों पर नौ हजार से अधिक नक्काशियां हैं। इसके अलावा निचली स्पीति में 24 से अधिक स्थलों पर लगभग 1400 बोल्डरों पर छह हजार से अधिक पेट्रोग्लिफ्स पाए गए हैं।हिमाचल प्रदेश में दुर्लभ धरोहरों को खोजने के लिए 2017 से 2021 तक सर्वे किया गया था। इस दौरान यह प्राचीन शिलाचित्र स्पीति घाटी से प्राप्त हुए थे। स्पीति की किब्बर घाटी से 2017 में 14 हजार 400 फीट की ऊंचाई से 1700 साल पुराने शवागार संस्कृति के अवशेष भी खोजे गए थे। इन्हें संग्रहालय में संरक्षित करके रखा है।
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