विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर शिमला में पर्यावरणीय चुनौतियों और समाधान पर मंथन।
शिमला,रिपोर्ट नवीन शर्मा
SFI शिमला शहरी कमेटी द्वारा आगामी 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में प्रदेश स्तरीय NGO Himalayan Centre for Human Development के सहयोग से “जलवायु परिवर्तन” विषय पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में विभिन्न स्कूलों के छात्रों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में अशोक ठाकुर उपस्थित रहे।सेमिनार को संबोधित करते हुए अशोक ठाकुर ने कहा कि आज जलवायु परिवर्तन केवल एक पर्यावरणीय संकट नहीं है, बल्कि यह मौजूदा आर्थिक और राजनीतिक नीतियों का परिणाम भी है।
उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा अपनाई जा रही नव-उदारवादी नीतियों के तहत प्राकृतिक संसाधनों को कॉरपोरेट घरानों के लिए खोला जा रहा है, जिसके चलते जल, जंगल और जमीन का अंधाधुंध दोहन हो रहा है।उन्होंने कहा कि विकास के नाम पर बड़े-बड़े प्रोजेक्ट, खनन गतिविधियाँ, वनों की कटाई तथा पर्यावरणीय नियमों में लगातार ढील दी जा रही है, जिससे जलवायु संकट और अधिक गंभीर होता जा रहा है।अशोक ठाकुर ने आगे कहा कि सरकारें एक ओर जलवायु परिवर्तन पर चिंता व्यक्त करती हैं, जबकि दूसरी ओर उनकी नीतियाँ इसके विपरीत दिशा में काम करती हैं। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कानूनों को कमजोर किया जा रहा है और बड़े पूंजीपति समूहों को लाभ पहुँचाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को बढ़ावा दिया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि इसके परिणामस्वरूप हिमाचल प्रदेश सहित पूरे देश में भूस्खलन, बादल फटना, बाढ़, सूखा और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है।उन्होंने यह भी कहा कि पूंजीवादी विकास मॉडल मुनाफे को प्राथमिकता देता है, जबकि पर्यावरण और आम जनता के हितों की अनदेखी करता है। प्राकृतिक संसाधनों के असीमित दोहन और निजीकरण की नीतियों ने पर्यावरणीय संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक प्रभाव गरीबों, किसानों, मजदूरों, विद्यार्थियों और वंचित वर्गों पर पड़ रहा है, जबकि इसके लिए जिम्मेदार बड़े उद्योग और कॉरपोरेट घराने अक्सर जवाबदेही से बच जाते हैं।सेमिनार में यह मांग रखी गई कि सरकार पर्यावरण विरोधी और कॉरपोरेट-परस्त नीतियों को वापस ले, पर्यावरणीय मंजूरी प्रक्रियाओं को मजबूत करे, जंगलों एवं प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा सुनिश्चित करे तथा ऐसी विकास नीतियाँ अपनाए जो पर्यावरण और जनहित को केंद्र में रखकर बनाई जाएं।वक्ताओं ने कहा कि जलवायु संकट का समाधान केवल तकनीकी उपायों से नहीं, बल्कि उन आर्थिक नीतियों में बदलाव से संभव है जो प्रकृति के निरंतर शोषण को बढ़ावा देती हैं।SFI ने युवाओं और विद्यार्थियों से पर्यावरण संरक्षण तथा जलवायु न्याय के संघर्ष को मजबूत करने का आह्वान किया और कहा कि पर्यावरण बचाने की लड़ाई सामाजिक न्याय और जनहित की लड़ाई से जुड़ी हुई है।

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