नवजातों में बढ़ सकता है सेप्सिस का खतरा
शिमला,ब्यूरो रिपोर्ट
गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच न कराना और साफ-सफाई में लापरवाही नवजात शिशुओं के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। आईजीएमसी शिमला के बाल रोग विशेषज्ञों के अध्ययन में सामने आया है कि ऐसी परिस्थितियों के कारण नवजातों में सेप्सिस (खून में फैलने वाला बैक्टीरियल संक्रमण) का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
यह संक्रमण समय पर इलाज न मिलने पर शिशु की मौत का कारण भी बन सकता है। समय से पहले बच्चे का जन्म भी मामले को गंभीर कर देता है। हैरानी की बात तो यह है कि अस्पतालों में भी प्रसव के समय स्वच्छता की कमी भी नवजात शिशुओं में सेप्सिस बीमारी के खतरे को कई गुना बढ़ा रही है। हालांकि, अगर समय पर जांच और अनियमितताओं की ओर ध्यान दिया जाए तो नवजात की मृत्यु दर को कम किया जा सकता है।इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञों ने 2023-2025 के बीच कमला नेहरू अस्पताल शिमला में हुए प्रसव और गर्भावस्था के दौरान जांच करवाने वालों पर केस कंट्रोल स्टडी की। इसमें सेप्सिस होने के कारणों के कई खुलासे हुए हैं। वर्ल्ड जर्नल ऑफ क्लीनिकल पीडियाट्रिक्स में हाल ही में शोध को प्रकाशित भी किया गया है। बाल रोग विशेषज्ञों की ओर से 453 नवजात शिशुओं और माताओं पर अध्ययन किया गया।
इसमें 146 बच्चे सेप्सिस बीमारी की चपेट में पाए गए। इन मामलों में 65.8 फीसदी लड़के थे, जबकि बच्चियों की संख्या कम थी।जब जानकारी ली गई तो मामलों में नवजात शिशुओं की औसत गर्भकालीन अवधि 36.5 सप्ताह थी। वहीं, 37 फीसदी बच्चे ऐसे थे, जिनमें तेज सांस लेना, 32.9 फीसदी की छाती का अंदर की ओर धंसना, 13.7 फीसदी में सुस्ती, 14.4 फीसदी में पीलिया और 8.2 फीसदी में कम पोषण जैसे लक्षण पाए गए थे। इसके अलावा 13.7 फीसदी बच्चों में बुखार (38 डिग्री सेल्सियस से कम) था, जबकि 4.8% मामलों में हाइपोथर्मिया (36.5 डिग्री सेल्सियस से कम) भी दर्ज किया। एपनिया के 8.2 फीसदी और दौरे के 6.8 फीसदी मामले पाए गए। साथ ही 2.1 फीसदी मामलों में जन्मजात विकृतियां देखी गई थीं।

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