हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया सीमांकन पर सहमति देने के बाद बाद में आपत्ति नहीं की जा सकती
शिमला, ब्यूरो रिपोर्ट
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई पक्षकार राजस्व अधिकारियों की ओर से की गई जमीन की पैमाइश डिमार्केशन के समय मौके पर मौजूद है और उसने बिना किसी आपत्ति के उस पर हस्ताक्षर किए हैं, तो बाद में उसे कानूनी आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती है। न्यायाधीश ज्योत्स्ना रिवाल दुआ की अदालत ने अपने आदेश में हिमाचल प्रदेश भू-राजस्व (संशोधन) अधिनियम 2023 की धारा 107(7) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि यदि सभी संबंधित पक्ष सीमांकन से सहमत हैं और मौके पर कोई आपत्ति नहीं उठाई गई है, तो उस आदेश के खिलाफ कोई अपील नहीं की जा सकती।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने खुद स्वीकार किया था कि सीमांकन सही है। ऐसे में बाद में यह कहना कि प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, कानूनन गलत है। कोर्ट ने कहा कि जो को-शेयर मौके पर नहीं थे, अगर उन्हें कोई समस्या होती तो वे खुद आपत्ति जताते। याचिकाकर्ता उनकी ओर से दलील नहीं दे सकता।याचिकाकर्ता ने खुद माना था कि सीमांकन जरीब (चैन मेजरमेंट) से हुआ और वह उससे संतुष्ट थे। न्यायालय ने राजस्व अधिकारियों के पिछले आदेशों को सही ठहराते हुए याचिका को खारिज कर दिया है। यह मामला मंडी जिले की सुंदरनगर तहसील के मोहल पाड़सल का है। याचिकाकर्ता ने सीमांकन के लिए आवेदन किया था।
18 फरवरी 2019 को राजस्व अधिकारियों ने मौके पर जाकर सीमांकन किया। उस समय याचिकाकर्ता सहित सभी उपस्थिति अन्य पक्षों ने एक संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर किए थे कि सीमांकन राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार सही तरीके से हुआ है और उन्हें यह स्वीकार है।सीमांकन होने के कुछ समय बाद, याचिकाकर्ता ने सहायक कलेक्टर (द्वितीय श्रेणी) के पास आपत्ति दर्ज कराई कि सीमांकन के समय तय बिंदुओं को दर्ज नहीं किया गया और कुछ सह-पार्टियां मौके पर मौजूद नहीं थी। जब तीन राजस्व अदालतों (कलेक्टर और डिवीजनल कमिश्नर) ने उनकी आपत्तियों को खारिज कर दिया, तो उन्होंने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट ने आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की नियुक्ति को चुनौती देने वाली एक याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि यदि उम्मीदवार चयन प्रक्रिया से संतुष्ट नहीं था, तो उसे निर्धारित समय के भीतर अपील करनी चाहिए थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि सीधे रिट याचिका के माध्यम से ऐसी नियुक्ति को चुनौती नहीं दी जा सकती, जिसके लिए पहले ही एक वैधानिक अपील का रास्ता उपलब्ध था और जिसका उपयोग नहीं किया गया। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता नियुक्ति नीति के क्लॉज-12 में यदि कोई उम्मीदवार नियुक्ति से संतुष्ट नहीं है, तो उसे 15 दिन के भीतर संबंधित उपायुक्त के पास अपील करनी होती है। याचिकाकर्ता ने ऐसी कोई वैधानिक अपील दायर नहीं की। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता की ओर से उपायुक्त को दी गई शिकायत काफी अस्पष्ट थी। उसमें केवल यह लिखा गया था कि वह साक्षात्कार से संतुष्ट नहीं है, लेकिन चयन प्रक्रिया में किसी विशिष्ट गड़बड़ी या कमी का कोई उल्लेख नहीं था। न्यायालय ने प्रवीणा देवी बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य मामले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि इस योजना के तहत देरी को माफ करने का कोई प्रावधान नहीं है और अपील निर्धारित 15 दिनों के भीतर ही होनी चाहिए।अदालत ने यह भी संज्ञान में लिया कि निजी प्रतिवादी पिछले 12 वर्षों से अधिक समय से इस पद पर अपनी सेवाएं दे रही है। यह मामला जिला किन्नौर के कल्पा स्थित एक आंगनबाड़ी केंद्र से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने वर्ष 2013 में हुई आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की नियुक्ति को चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि वे प्रतीक्षा सूची में पहले स्थान पर थी और प्रतिवादी चयनित उम्मीदवार की नियुक्ति नियमों के विरुद्ध थी।
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